धूल भरे आईने में चाँद का रास्ता
एक छोटा-सा नगर और एक बेचैन युवक
भारत के पश्चिम में, जहाँ शाम को मंदिरों की घंटियाँ और दूर जाती रेल की सीटी एक-दूसरे में घुल जाती थीं, वहाँ एक छोटा-सा नगर था—सूरजपुर। नगर इतना पुराना था कि उसकी गलियों के पत्थर भी लोगों की आदतों को पहचानते थे। बरगद के पेड़ चौपालों पर ऐसे खड़े रहते जैसे वे मनुष्यों के सारे रहस्य अपने भीतर बाँधकर बैठे हों।
उसी नगर में नील नाम का एक युवक रहता था। उसके पिता मिट्टी के दीपक बनाते थे, और माँ तुलसी के पौधों से बातें करती थीं। नील बचपन से ही विचित्र स्वभाव का था। जब दूसरे बच्चे पतंग उड़ाते, वह आसमान को घूरकर सोचता कि बादल आखिर इतने बेचैन क्यों रहते हैं।
जैसे-जैसे वह बड़ा हुआ, उसकी बेचैनी भी बड़ी होती गई। उसे लगता कि दुनिया बिगड़ चुकी है। लोग झूठ बोलते हैं, रिश्वत लेते हैं, धर्म के नाम पर लड़ते हैं, और गरीब की थाली से रोटी तक चुरा लेते हैं। वह अक्सर चौक पर खड़ा होकर भाषण देता—
“यह दुनिया बदलनी चाहिए!”
लोग सिर हिलाते, कुछ ताली बजाते, और फिर घर जाकर वही पुराने झूठ बोलने लगते।
नील को इससे और क्रोध आता।
रहस्यमयी बूढ़ा और पीतल का आईना
एक वर्ष नगर में भयंकर सूखा पड़ा। कुएँ आधे खाली हो गए और लोगों के चेहरों पर धूल जमने लगी। उन्हीं दिनों नगर में एक बूढ़ा फकीर आया। उसकी दाढ़ी धुएँ जैसी सफेद थी और आँखें ऐसी कि जैसे उनमें रात का आकाश रखा हो।
वह बाजार में बैठकर पीतल के पुराने आईने बेचता था।
“आईना ले लो,” वह पुकारता, “यह चेहरा नहीं, सत्य दिखाता है।”
लोग हँसते। किसी ने कहा, “सत्य देखने से अच्छा है, दो किलो गेहूँ मिल जाए।”
लेकिन नील उस बूढ़े के पास गया।
“क्या तुम्हारा आईना सचमुच सत्य दिखाता है?” उसने पूछा।
फकीर मुस्कुराया। “सत्य हमेशा दिखता है बेटा, बस मनुष्य उसे देखने से डरता है।”
नील ने अपनी बचत के सारे सिक्के देकर वह आईना खरीद लिया।
रात को उसने कमरे में दीपक जलाया और आईने में देखा। पहले तो उसे अपना ही चेहरा दिखाई दिया—थका हुआ, क्रोधित और अधीर। फिर धीरे-धीरे प्रतिबिंब बदलने लगा।
उसने देखा कि चौक पर भाषण देते समय उसके भीतर कितनी घृणा भरी होती है। उसने देखा कि गरीबों की सहायता करते समय भी वह मन ही मन चाहता था कि लोग उसकी प्रशंसा करें। उसने देखा कि पिता की साधारण जिंदगी से उसे शर्म आती थी।
आईने में उसका चेहरा नहीं, उसका अहंकार दिखाई दे रहा था।
नील घबरा गया। उसने आईना कपड़े से ढँक दिया। पर विचित्र बात यह थी कि ढँके हुए आईने से भी हल्की रोशनी बाहर आ रही थी।
नदी के किनारे का साधु
अगले दिन वह फकीर को ढूँढ़ने निकला, पर वह कहीं नहीं मिला। लोग कहने लगे कि शायद वह कोई साधु था, या शायद कोई पागल।
भटकते-भटकते नील नदी के किनारे पहुँचा। वहाँ एक वृद्ध साधु पीपल के नीचे बैठा था। उसकी उँगलियों में मिट्टी लगी थी और वह छोटे-छोटे दीप बना रहा था।
“क्या तुम वही फकीर हो?” नील ने पूछा।
साधु हँस पड़ा। “मनुष्य हर रहस्य को नाम देना चाहता है।”
नील ने सब कुछ बता दिया—आईना, अपने दोष, अपनी शर्म।
साधु ने एक दीप उठाया और कहा, “अगर यह दीप बुझा हो, तो क्या तुम इससे दूसरे दीप जला सकते हो?”
“नहीं,” नील बोला।
“और यदि मनुष्य का अपना मन अँधेरे में हो, तो क्या वह संसार को प्रकाश दे सकता है?”
नील चुप हो गया।
साधु ने नदी की ओर देखा। “दुनिया को बदलने की इच्छा बुरी नहीं। पर अधिकतर लोग दुनिया को इसलिए बदलना चाहते हैं ताकि उन्हें स्वयं को न बदलना पड़े।”
यह बात नील के भीतर कहीं गहराई में उतर गई, जैसे बरसात की पहली बूँद सूखी मिट्टी में उतरती है।
परिवर्तन की धीमी शुरुआत
उस दिन के बाद नील ने भाषण देना बंद कर दिया। नगर वालों को बड़ा आश्चर्य हुआ। कुछ ने सोचा कि वह बीमार पड़ गया है, कुछ ने कहा कि उसे प्रेम हो गया होगा—क्योंकि भारत में आदमी या तो प्रेम में बदलता है या फिर बिजली के बिल से।
लेकिन सच्चाई कुछ और थी।
नील अब सुबह पिता के साथ मिट्टी गूँधने लगा। पहले उसे यह काम छोटा लगता था, अब वह हर दीपक को ऐसे बनाता जैसे किसी की अँधेरी रात के लिए चाँद गढ़ रहा हो।
वह माँ के साथ बैठकर चुपचाप तुलसी में पानी डालता। पहले जहाँ उसे हर आदमी में दोष दिखते थे, अब वह लोगों की थकान देखने लगा।
उसने पाया कि जो दुकानदार कम तौलता है, वह रात को बीमार बेटे के लिए दवा खरीदने की चिंता में सो नहीं पाता। जो पड़ोसी हर समय क्रोधित रहता है, उसकी पत्नी वर्षों पहले उसे छोड़कर चली गई थी। जो अधिकारी रिश्वत लेता है, वह भीतर से इतना डरा हुआ है कि ईमानदारी उसे भूख जैसी लगती है।
धीरे-धीरे नील के भीतर करुणा जन्म लेने लगी।
नगर में फैलती अदृश्य रोशनी
कुछ महीनों बाद सूरजपुर में अजीब परिवर्तन दिखने लगे।
कुम्हारों की बस्ती में लोग एक-दूसरे की मदद करने लगे। चौक का वही दुकानदार अब कभी-कभी गरीब बच्चों को मुफ्त गुड़ दे देता। मंदिर के पुजारी और मस्जिद के इमाम, जो वर्षों से एक-दूसरे से नहीं बोलते थे, एक दिन साथ बैठकर बारिश की प्रार्थना करने लगे।
लोग समझ नहीं पा रहे थे कि यह बदलाव कैसे आया।
असल में बदलाव हवा की तरह आया था—बिना शोर, बिना घोषणा।
नील अब भी वही युवक था, पर उसके भीतर का क्रोध पिघल चुका था। उसकी आँखों में एक शांत चमक आ गई थी। लोग उसके पास सलाह लेने आने लगे।
एक दिन एक बालक ने पूछा, “भैया, आपने दुनिया बदलने का सपना छोड़ दिया क्या?”
नील मुस्कुराया।
“नहीं,” उसने कहा, “बस अब मैंने शुरुआत सही जगह से की है।”
अंतिम रहस्य
कई वर्ष बीत गए। सूरजपुर फिर हरा-भरा हो गया। नदियाँ भर गईं, और लोगों के चेहरों पर भी थोड़ी नमी लौट आई।
एक रात नील ने पुराने संदूक से वह पीतल का आईना निकाला। उसने देखा कि आईने पर धूल जम चुकी थी।
जब उसने उसे साफ किया, तो उसमें अपना चेहरा दिखाई दिया—शांत, साधारण, और थोड़ा वृद्ध।
फिर अचानक आईने में वही फकीर दिखाई दिया।
“क्या अब तुम दुनिया बदलना जानते हो?” उसने पूछा।
नील ने धीरे से सिर झुका दिया।
“हाँ,” वह बोला, “मनुष्य संसार को अपने शब्दों से कम, अपने स्वभाव से अधिक बदलता है।”
फकीर मुस्कुराया। फिर उसका प्रतिबिंब धुएँ की तरह विलीन हो गया।
उस रात नील ने आकाश की ओर देखा। उसे लगा जैसे चाँद कोई दूर की वस्तु नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर जलता हुआ एक छोटा दीप है—जिसे बस धूल से साफ करने की देर है।
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