पूर्णकालिक इंसान या अंशकालिक जीवन? एक छोटा सा प्रश्न, गहरा असर ज़रा ईमानदारी से देखिए—आप दिनभर में कितनी बार पूरी तरह उपस्थित होते हैं? और कितनी बार सिर्फ़ चल रहे होते हैं, जैसे कोई प्रोग्राम बैकग्राउंड में चल रहा हो? सुबह उठते ही मोबाइल, फिर काम, फिर बातचीत में भी आधा ध्यान कहीं और। ऐसा लगता है जैसे हम जीवन को “पूरा” नहीं जी रहे, बल्कि टुकड़ों में बाँटकर निभा रहे हैं। यही अंशकालिक इंसान होने का संकेत है—जहाँ शरीर यहाँ है, पर मन कहीं और भटक रहा है। अब सवाल यह नहीं है कि आप क्या कर रहे हैं। सवाल यह है कि आप कैसे कर रहे हैं। क्या आप उसमें पूर्ण रूप से उपस्थित हैं? अंशकालिक जीवन की आधुनिक कहानी आज की दुनिया में व्यस्तता एक सम्मान बन गई है। अगर आप व्यस्त हैं, तो आप महत्वपूर्ण हैं—यह धारणा गहराई तक बैठ गई है। लेकिन इस व्यस्तता में एक सूक्ष्म थकान छिपी होती है। आपने ध्यान दिया होगा—दिनभर काम करने के बाद भी एक अजीब खालीपन रहता है। जैसे कुछ छूट गया हो। यह खालीपन इसलिए नहीं कि आपने कम किया, बल्कि इसलिए कि आपने जो भी किया, उसमें आप पूरी तरह थे ही नहीं । यहाँ एक छोटा प्रयोग करें: आज किसी ए...
मैं डॉ. लाल करुण हूँ। रहस्यमय चेतना वास्तुकार | ब्लॉगर | जीवन प्रशिक्षक | अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त ध्यान विशेषज्ञ | मानव चेतना अनुसंधानकर्ता | पर्यावरण कार्यकर्ता | लेखक | कवि | उद्यमी | बहुभाषी